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वन मेले में स्थानीय वैद्यों का लगा जमावड़ा, जड़ी बूटी से करते हैं उपचार

डिंडोरी। मानव शरीर में आने वाली परेशानियों व व्याधियों के लिए भले ही वैज्ञानिक उपचार मौजूद हैं लेकिन वैज्ञानिक तरीके से उपचार जहां महंगा है वहीं वह कारगर हो इसकी संभावना भी अधिक नहीं है कई बार सालों के उपचार से भी रोग व्याधि तो ठीक नही होती उल्टे विपरीत परिणाम भी सामने आते हैं, दूसरी ओर हमारे समाज में ही ज्ञान का भंडार भरा पड़ा है और इस ज्ञान का स्त्रोत भी प्रकृति ने हमें दिया है सदियों से प्रकृति के इन उपहारों ने मानव जीवन के लिए वनस्पतियों और जड़ी बूटी के रूप में हमे अपने अमूल्य उपहारों से नवाजा है। अब आधुनिकता की दौड़ में हम इन पारंपरिक और प्राकृतिक तरीकों से दूरी बना चुके हैं बावजूद इसके आज भी समाज में ऐसे जानकर जिन्हे हम स्थानीय वैद्य के रूप में जानते हैं उन्होंने पारंपरिक व प्राकृतिक ज्ञान को बचाकर रखा हुआ है डिंडोरी जिले के ऐसे ही गुणी वैद्य हैं जो लंबे समय से समाज में प्रकृति से मिले वानस्पतिक उपहार से लोगो का निःशुल्क इलाज कर रहे हैं। इस वैद्यों की खास बात यह है कि इनका शुल्क या तो नही है और अगर है भी तो न के बराबर। इन वैद्यों के पास ज्ञान का तो भंडार है जिसका यह उपयोग करते हैं लेकिन उस ज्ञान की मार्केटिंग और प्रस्तुतिकरण का अभाव है जिस कारण आज भी वह छोटे क्षेत्र तक सीमित हैं।

बांझपन दूर करने में बुधिया बाई को महारत
डिंडोरी जिले के रंजरा गांव की रहने वाली बुधिया बाई लगभग 55 सालों से क्षेत्र में अपनी सेवा दे रहीं हैं और दूर दूर से इनके पास लोग इलाज कराने आते हैं उन्हें संख्या की स्पष्ट जानकारी तो नही है पर लगभग हजारों की संख्या में लोगों का उपचार किया है मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ के मरीज इनके पास आते हैं, इनके पति थान सिंह क्षेत्र में जाने माने वैद्य रहे हैं और उपचार की विधा बुधिया ने उन्हीं से सीखा है विभिन्न बीमारियों के उपचार के अलावा बुधिया बांझपन का इलाज करती है।

चर्मरोग और कैंसर का इलाज करते हैं बारेलाल
रंजरा गांव के बारेलाल को भी प्राकृतिक उपचार की विधा विरासत में मिली है और पिता थान सिंह ने उन्हें जड़ी बूटी की पहचान उसके उपयोग के बारे में प्रशिक्षित किया वह क्षेत्र में पिछले 20 सालों से उपचार कर रहे हैं चर्मरोग और कैंसर जैसी बीमारी के लिए दूर दूर से लोग इनके पास आते हैं।

जड़ी बूटी से इलाज में माहिर हैं वैद्य
स्थानीय जंगलों से प्राप्त जड़ी बूटी का इलाज यहां के वैद्य सदियों से करते आ रहे हैं, कन्हारी के राय सिंह पीलिया का शर्तिया इलाज करते हैं वहीं रंजरा के समारू मिर्गी के उपचार में महारत रखते हैं। जीलंग के बंशू सिंह शरीर के अंदर और बाहर की गांठ का इलाज कर रहे हैं।

नाड़ी छूकर मर्ज का पता लगाते हैं बिरसू
केवलारी गांव के बिरसू सिंह मरीज की नाड़ी छूकर बीमारी का पता लगाते हैं, शरीर में विकलांगता, धात, बवासीर, मिर्गी, किडनी, पथरी, त्वचा रोग का उपचार 45 वर्षों से कर रहे हैं।

हड्डी तक जोड़ देते हैं वैद्य
बैगा चक के वैद्य अपनी जड़ी बूटी के उपचार से टूटी हड्डी भी जोड़ देते हैं पोंडी के रामप्रसाद को इसमें महारत है वहीं पुरानी खांसी का इलाज भी यह करते हैं। पोंड़ी के ही अमृतलाल अर्धकपारी, सर्पदंश का इलाज करते हैं। ढाबा के बरिया सिंह लकवा और गठिया का उपचार देते हैं ढाबा के लाल साय और मोती सिंह के पास कैंसर, मासिक धर्म, लकवा के उपचार का दावा है। गौरा के राजाराम मस्सा, पेट फूलना, सरदर्द, आंव, प्रसव उपरांत दूध न बनने और प्रसव उपरांत जड़ी सहित हड्डी रोगों के जानकार हैं। गौरा के प्रसादी, लालसाय, शीतलपानी के समारु और शंकरलाल के पास पीलिया, पेट दर्द, सरदर्द, मोटापा, सर्पदंश, बिच्छू काटने, कुत्ता काटने का उपचार मौजूद है।

जिला प्रशासन द्वारा कलेक्टर विकास मिश्रा के निर्देशन में आयोजित वन मेले में इन स्थानीय वैद्यों की विधा की जानकारी सभी को मिली। वैसे इन वैद्यों की पड़ताल 2004 में ही निवसीड संस्था के बलवंत राहंगडाले ने की थी जब उन्होंने जंगल अध्ययन मंडल के माध्यम से इन वैद्यों की जानकारी एकत्र की थी। बैगाचक में जड़ी बूटियों का भंडार है तो यहां जानकार भी मौजूद हैं जिन्हे इस वन मेले के माध्यम से एक मंच भी मिला है।

 

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