आज भी पक्की सड़क के इंतजार में पथराई आँखें, मूलभूत सुविधाओं के लिए जद्दोजहद
अमित साहू, 7771942755

आजादी के आठवे दशक में पक्की सड़क का इंतजार, जनपद पंचायत करंजिया अंतर्गत ग्राम पंचायत जुगदई के ग्राम में करोंदी, आखिर लोगों को क्यों नहीं मिल रही मूलभूत सुविधाएं, गर्भवती महिलाओं को खाट से लेकर जाना पड़ता है मुख्य मार्ग तक

डिंडोरी जिले का गांव जहां आज भी गांव के रहवासी अपनी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं, गांव में एक आंगनबाड़ी भवन और एक प्राथमिक शाला है, जो जर्जर हो चुके हैं आंगनबाड़ी किराये के कमरे में तो प्राथमिक शाला अतिरिक्त कक्ष में लगता है जोकि बरसात के मौसम में टपकता रहता है। इस गांव में जहां 250-300 लोग निवासरत है। गांव के दूसरी ओर एक नदी के उस पार ग्राम पंचायत भवन जुगदई, 12 वी तक विद्यालय, हास्टल, खाद्य दुकान है पर नदी पार करने के लिए न ही पुल है न ही नदी तक पहुंच मार्ग।
हम बात कर रहे हैं डिंडोरी जिले के विकास खंड करंजिया अंतर्गत ग्राम पंचायत जुगदई के पोषक ग्राम करोंदी की जहां लोग सुविधाओं के आभाव में गुमनामी की जिंदगी जी रहे हैं। गांव में पहुंचने के लिए कीचड़ भरे रास्तों से होकर गुजरना पड़ता है और ग्रामीण बताते हैं कि उन्हें आवागमन के अभाव में बच्चों को विद्यालय पहुंचने और किसी बीमार व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने में कितनी दिक्कत होती होगी। बरसात में ही नहीं बारह महीने इस गांव में एम्बूलैंस नहीं जा पाती है और गांव के बीमार लोगों और गर्भवती महिलाओं को खटिया के माध्यम से मुख्य सड़क तक लगभग आधा से एक किलोमीटर पैदल चलकर लाना पड़ता है। ग्रामीण बताते हैं कि यहां ना पीने के लिए शुद्ध पानी मिल पा रहा है और न ही शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था। सड़क न होने के चलते नदी के दूसरी ओर ग्राम पंचायत तक जाने के लिए बरसात में 10 किलोमीटर का चक्कर लगाकर जाना पड़ता है। अस्पताल और राशन के लिए भी जाना मजबूरी बनी रहती है जिसके लिए हमको 10-15 किलोमीटर चक्कर लगाकर जाना पड़ता है।

इनका कहना है
हमारे गांव में रोड़ का बहुत समस्या है हम लोग चल नहीं पाते है
– शिवकरण, ग्रामीण
हमारे बच्चे बरसात में स्कूल नहीं जा पाते क्योंकि पुल नहीं बना है, राशन लेने 10-15 किलोमीटर चक्कर लगाकर जाना पड़ता है
– संजय, ग्रामीण
हमारे यहां रोड़ की बहुत समस्या है, सरकार से मांग है की रोड़ बनाया जाए
– चैन सिंह , पंच ग्राम पंचायत जुगदई
हमारे यहां यदि कोई बीमार हो जाए तो उसको खटिया में लेकर जाना पड़ता है, 12 महिने यहां गाड़ी और एम्बूलैंस नहीं आ पाती है – कविता बाई, ग्रामीण