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पाटनगढ़ में आयोजित वनजन कला शिविर एवं प्रशिक्षण कार्यशाला का हुआ समापन

डिंडोरी-महाकवि कालिदास ने अपने साहित्य, संस्कृति, संस्कार का भावबोध कराया है। उन्होंने प्रायः सभी कलाओं के संकेत दिये हैं। चित्रकला मानवजीवन में संस्कृति का संरक्षण करती है। गोदना शैली अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इससे सौन्दर्य के साथ रोगों का उपचार भी होता है। इस कला में प्रतीकों के गूढ निहितार्थ हैं जिन्हें समझने की आवश्यकता है।कालिदास संस्कृत अकादमी, उज्जैन द्वारा पाटनगढ़ में आयोजित वनजन कलाशिविर एवं प्रशिक्षण कार्यशाला के समापन पर अध्यक्षता करते हुए इन्दिरा गांधी जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकण्टक के कुलपति प्रो. श्री प्रकाशमणि त्रिपाठी ने ये विचार व्यक्त किए।
मुख्य अतिथि पदमश्री दुर्गाबाई व्याम ने कहा कि अपनी पहचान को कला संस्कृति के माध्यम से संरक्षित किया जा सकता है। इन चित्रों में हमारे संकेत बोलते हैं। अकादमी का यह आयोजन इस दिशा में अभिनन्दनीय है।

स्वागत भाषण देते हुए अकादमी के निदेशक डॉ. सन्तोष पण्ड्या ने कहा कि अकादमी संस्कृत भाषा-साहित्य के साथ पारम्परिक लोक शैलियों के संरक्षण के लिये वर्ष भर आयोजन करती है प्रारम्भ में अतिथियों ने दीप प्रज्वलन, सरस्वतीपूजन किया एवं शिविर में निर्मित चित्रों का अवलोकन किया। अतिथियों का स्वागत डॉ. सन्तोष पण्ड्या ने किया तथा आभार प्रदर्शन शिविर के प्रभारी मुकेश काला ने किया। कलाकारों को प्रमाण पत्र भी प्रदान किए गए।इस कार्यशाला में सुश्री मंगलाबाई, सुश्री जमनी बाई, श्री मोहन गीर तथा श्री पवन गीर ने • कालिदास की नायिकाओं का गोंड, कोरक, बैगा, बंजारा गोदना शैली में चित्रांकन किया तथा चालीस प्रशिक्षणार्थियों को प्रशिक्षण दिया। इस अवसर पर डॉ. आलोक श्रोत्रिय, डॉ. सामल शुक्ला सहित क्षेत्र के अनेक कलारसिक उपस्थित थे।

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