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मूल्य वर्धित मछली उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण

डिण्डोरी। स्थाई आजीविका और उद्यमिता के विकास के लिए स्व सहायता समूह सदस्यों एवं लीडर्स को दिया गया मूल्य वर्धित मछली उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण । प्राचीन काल से ही मछली का मानव के भोजन मैं विशेष स्थान रहा है । अपनी पौष्टिकता एवं पोषण के लिए मछली जानी जाती है। इसमें उच्च गुणवत्ता के प्रोटीन और फैटी एसिड पाए जाते हैं साथ ही साथ इन्हें पचाना भी आसान है ।आज के बदलते परिवेश में रेडी टू ईट खाद्य पदार्थों की लगातार मांग भी बढ़ रही है साथ ही साथ डिंडोरी जैसे सुदूर आदिवासी बहुल जिले में स्थानीय स्तर पर मछली सस्ता और उच्च क्वालिटी वाले प्रोटीन की एकमात्र स्रोत है । जबकि दूसरी ओर इससे कम लागत वाले पौष्टिक उत्पाद तैयार कर स्थानीय स्तर पर आजीविका उपलब्ध हो सकती है । स्वरोजगार के लिए मूल्य वर्धित मछली के उत्पाद काफी बेहतरीन विकल्प है । इन बातों को ध्यान में रखते हुए कृषि विज्ञान केंद्र डिंडोरी द्वारा लघु लघु मत्स्य प्रसंस्करण इकाई की स्थापना की गई है जिसके द्वारा स्थानीय मछुआरों को मछली से विभिन्न उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता है । इसी कड़ी में कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक डिंडोरी के वित्तीय सहायता से “मछली से मूल्य वर्धित उत्पाद कैसे बनाएं ” विषय पर प्रशिक्षण आयोजित किया गया। कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा संचालित लघु मत्स्य प्रसंस्करण इकाई के प्रभारी डॉ. सतेन्द्र कुमार ने मछलियों से बनाए जाने वाले विभिन्न उत्पादों की जानकारी दी और इससे संभावित स्वरोजगार के बारे में भी विस्तार से बताया। उन्होंने बताया की मछलियों से निर्मित उत्पाद पोषण के साथ ही साथ स्थानीय रोजगार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इस दौरान उन्होंने मछली के अचार, मछली की चकली, मछली की कटलेट और मछली के पापड़ पर विशेष चर्चा की। स्थानीय स्व सहायता समूह की आदिवासी महिलाओं ने प्रशिक्षण के दौरान 5-5 महिलाओं का समूह बनाकर मछली अचार तैयार किया। प्रसंस्करण के लिए निर्धारित मापदंडों को समझते हुए स्व सहायता समूह की महिलाओं ने प्रसंस्करण के दौरान उपयोग की जाने वाली वस्त्र, दस्ताने, हेडगियर और का भी उपयोग किया। इस कार्यक्रम में स्व सहायता समूह की 20 महिलाओं और दो पुरुषों ने भाग लिया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री अखिलेश कुमार वर्मा,जिला विकास प्रबंधक, राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक डिंडोरी ने स्व सहायता समूह की महिलाओं को संबोधित करते हुए मछली से बनाए जाने वाले विभिन्न उत्पादों का स्वरोजगार और आजीविका के लिए नाबार्ड की प्रतिबद्धता पर जोर दिया और आगे भविष्य में इस तरह के और कार्यक्रम किए जाने की इच्छा जताई। उन्होंने बताया की नाबार्ड कृषि एवं संबंधित गतिविधियों के विकास में किसानों के सदैव साथ रहा है और ग्रामीण क्षेत्रों में अपेक्षित मदद के लिए सदैव तत्पर है। कार्यक्रम के अध्यक्ष डॉ. पी.एल. अंबुलकर ने नाबार्ड द्वारा दी गई वित्तीय सहायता पर प्रसन्नता जाहिर की और बताया कि मछली पालन और मछलियों से निर्मित उत्पाद कि जिले में बहुत ही संभावनाएं हैं। कृषि विज्ञान केंद्र इस दिशा में प्रमुखता प्रमुखता से कार्य कर रहा है। कार्यक्रम में बायफ संस्था से श्री रघुवंशी जी ने सफल कार्यान्वयन में विशेष योगदान दिया खासकर सेनगुड़ा गांव की आदिवासी महिला समूह के सदस्यों को इस प्रशिक्षण के लिए प्रेरित किया और कृषि विज्ञान केंद्र से जुड़ने में मदद की । मछली पालन विभाग जिला डिंडोरी के सहायक संचालक श्री दिनेश कुमार झारिया ने भी मछली पालकौ को मछली पालन के साथ मछली से उत्पाद बनाकर उसे बेचने और स्वयं ग्रहण करने की सलाह दी। कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केंद्र, डिंडोरी की सस्य विशेषज्ञ सुश्री श्वेता मसराम ने तकनीकी अधिकारी श्रीमती रेनू पाठक के साथ मिलकर विभिन्न गतिविधियों के संचालन में विशेष योगदान दिया।

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