प्रदेश

बुलंद हौसले और जज्बे के आगे नेत्रहीनता ने टेके घुटने.. माँ नर्मदा की परिक्रमा कर रहे सूरदास नीलेश, परिक्रमा पथ पर रोज चलते है 20 किमी लाठी बनी सहारा, जिसकी आवाज के सहारे बढ़ रहे आगे…

शहपुरा पहुंचने पर स्थानीयजनों ने किया स्वागत,


शहपुरा।नर्मदा परिक्रमा पथ पर एक से बढ़कर एक तपस्वी, संत, महात्मा और गृहस्थ परिक्रमा करते हुए आगे बढ़ रहे हैं। उन्हीं में से एक संत के हौसले और जुनून को देखकर उनके आगे नतमस्तक हो जाना कोई बड़ी बात नहीं है। परिक्रमावासी नीलेश धनगर 37 वर्ष निवासी इंदौर के मूसाखेड़ी निवासी जन्म से ही नेत्रहीन है। बावजूद इसके उन्होंने नर्मदा परिक्रमा करने की ठानी। नेत्र हीनता उनके जज्बें के आगे आडे नहीं आ पाई और अकेले ही एक डंडे के सहारे नर्मदा परिक्रमा पर निकल पड़े। माँ नर्मदा की इस परिक्रमा में उनके संगी साथी उनकी लाठी है, जो उन्हें कच्चे-पक्के रास्तों पर चलने में मदद कर रही है। आज उनका आगमन शहपुरा होने पर स्थानीयजनों ने उनका स्वागत किया,आज उनका विश्राम नगर के श्रीराम मंदिर रहेगा।नीलेश धनगर माँ नर्मदा के बुधनी तट से परिक्रमा शुरू की है। ये अब तक 24 दिन की यात्रा पूरी कर चुके हैं।
परिक्रमावासी नीलेश ने बताया कि वह राजनीति विज्ञान से एमए की पढ़ाई की हैं इसके साथ पीजीडीसीेए कम्प्यूटर कोर्स भी किया है। टाकिंग साफ्टवेयर की मदद से वह मोबाइल भी चलाते हैं। नीलेश के परिवार में सात सदस्य हैं। इन्होंने बताया कि मन में नर्मदा की परिक्रमा करने की इच्छा थी, लेकिन नेत्रहीनता के कारण साहस नहीं जुटा पा रहे थे। वे सोच रहे थे कि यात्रा कैसे कर पाएंगे। इसलिए पहले इंदौर से देवास, उज्जैन, ओंकारेश्वर व खंडवा की यात्रा की। जब यह यात्राएं सफलता से पूरी हो गईं तो उनका उत्साह बढ़ गया और उनके मन नर्मदा परिक्रमा करने की ठान ली। जिसके बाद 02 जनवरी 2023 को बुधनी घाट से नर्मदा परिक्रमा शुरू की।
नर्मदा परिक्रमा के लिये प्रेरित करना है लक्ष्य :
नीलेश का कहना है कि माँ नर्मदा हर संकट को हरने वाली हैं, इनकी कृपा का अनुभव करना हो तो एक बार परिक्रमा करके देख लेना चाहिए। मेरी परिक्रमा का उद्देश्य माँ नर्मदा की कृपा पाना तो है ही, इसके साथ ही लोगों की परिक्रमा के प्रति प्रेरित करना भी है। उन्होंने कहां कि जब मुझ जैसा नेत्रहीन भक्त माई की परिक्रमा कर सकता है, तो सामान्य व्यक्ति बड़ी ही आसानी से माँ नर्मदा की परिक्रमा कर सकता है। नर्मदा भक्तों को पेड़ पौधे काटना की नहीं चाहिये, यदि काटने की आवश्यकता पड़ भी जाये तो एक पेड़ के बदले कम से कम 4 पेड़ लगाना चाहिये।
माँ नर्मदा स्वयं ही करती हैं नीलेश महाराज ने बताया कि नर्मदा जी की जैसी महिमा वह अन्य परिक्रमावासियों से सुनते थे कि मां नर्मदा अपने भक्त को कोई कष्ट नहीं होने देेंती और मदद करती हैं, यह अब अनुभव हो रहा है। नेत्रहीन होने से वह भोजन नहीं बना पाते लेकिन अब तक एक भी दिन ऐसा नहीं गया, जब उन्हें भूखा सोने की नौबत आई हो। यात्रा में हर जगह उन्हें भोजन-प्रसादी मिल जाती है, नर्मदा भक्त रूकने की व्यवस्था भी कर देते हैं, रास्ता भी बता देते है।
लाठी बनी सहारा :
परिक्रमावासी का कहना है कि यात्रा में लाठी उन्हें बता देती है कि रास्ता कच्चा है या पक्का, जब लाठी कच्ची जगह में पड़ती है तो आवाज कम आती है तो समझ जाते हैं कि रास्ता कच्चा है और जब आवाज अधिक होती है तो पता चलता है कि पक्की सड़क है। उन्हें परिक्रमा में करीब 3600 किमी की यात्रा करना हैं। जिसे पूरा होने में छह से सात महिने का समय लग सकता है।
नेत्रहीन होने के बाद रोज चल रहे 20 किमी :
इनकी आस्था और बुलंद हौसला देखते ही बनता है। बिना नेत्रों के भी इनकी चलने की गति ऐसी है कि अच्छे अच्छे दांतों तले उंगलियां दबाने को मजबूर हो जाए, नीलेश महाराज को दृष्टिहीन होने का जरा भी दुख नहीं है, ये बिना किसी परेशानी के प्रतिदिन लगभग 20 किमी की पैदल परिक्रमा कर रहे है।

lokvichar

मीडिया भारत का महत्वपूर्ण अंग है,लोकविचार इस अंग को और मजबूत बनाने के लिए सच को लेकर काम करता है हमारा उद्देश्य आप तक सिर्फ सच को समय पर पहुचाना है हम निडर और निष्पक्ष होकर काम करने मे विश्वास करते है लोकविचार आमजन की समस्याओं को समाज के बीच रखता है-लोकविचार

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button