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Special on International Women’s Day:महिला सशक्तीकरण की अनूठी हस्ताक्षर शोभा…

डिंडोरी। विगत दो दशक से मध्यप्रदेश के डिंडौरी जिले के बैगाचक के नाम से प्रसिद्व बैगाओं के गांवों में महिला सशक्तीकरण के प्रयास के लिए कार्य कर रही शोभा तिवारी, बैगाओं के लिए अपनी बेटी और दीदी बनी हुई हैं। बैगा गांव में उनके कदम रखते ही पूरे गावं में आवाज होने लगती है दीदी आ गयी-दीदी आ गयी और आदिवासी इकठ्ठा होकर अपनी-अपनी परेशानियों को सुनाते है और उनसे आगे की रणनीति पर चर्चा करते हैं। उनका यह प्रयास बैगा आदिवासियों को अंधेरे से उजाले की ओर कदम बढाने में आत्मविश्वास पैदा करता है।

शोभातिवारी का मानना है कि समाज में अभी भी महिलाओं को दोयम दर्जा ही मिल सका है जबकि परिवार और समाज के निर्माण व संचालन में उनकी भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। उनका कहना है कि एक नारी मनुष्य होने के साथ-साथ वह दुनिया की आधी आबादी है। सृष्टि के निर्माण में उसका भी उतना ही सहयोग है जितना कि पुरुष का। वह केन्द्र सरकार के प्रगतिषील कानून वनअधिकार मान्यता कानून 2006 की प्रसंषा करते हुए बताती है कि इस कानून में वनाधिकार के उपभोग प्रमाणपत्र में महिलाओं के स्वामित्व को स्वीकारते हुए उनका नाम दर्ज किया जाता है। इससे महिलाओं के जीवन पर बड़ा प्रभाव पड़ा है। शोभा तिवारी कहती हैं कि कानून के क्रियांवयन से अब आदिवासी समाज निर्भिक होकर अपनी खेती किसानी कर रहा है और इससे उनके जीवन में बदलाव आया है। महिलायें अब पहले की अपेक्षा आर्थिक रूप से सषक्त हुई हैं। जो उनके पूरे भविष्य को तय करता है।
एकता परिषद के संस्थापक राजगोपाल पी.व्ही के नेतृत्व में चलायी गयी श्योपुर से रायगढ की पदयात्रा के दौरान उन्होनें बैगा जनजाति से रूबरू होने का अवसर मिला तब से वह इनके बीच बनी रह गयी। इनके प्रयास का ही परिणाम रहा कि वनाधिकार कानून लागू होने के बाद कई गांवो में बैगाओं को व्यक्तिगत और सामूहिक वनअधिकार मिला।

मूलरूप से छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में एक ब्राहम्ण परिवार में जन्मी शोभा तिवारी अब आदिवासी विशेषकर भारत सरकार के द्वारा घोषित अति पिछड़ी जनजाति बैगाओं के लिये पूर्णतः समर्पित हैं। दूर-दराज गांवो में जाना, आदिवासियों विषेषकर महिलाओं को संगठित करना, उनको अलग-अलग विषयों पर जानकारी देना, संगठित करना, उनमें नेतृत्व की कला विकसित करना और उनके माध्यम से उनकी समस्याओं को सरकार के सामने समाधान के लिए प्रस्तुत कराना और पैरवी करना शोभा तिवारी की दिनचर्या का प्रमुख हिस्सा है। समनापुर में अपने छोटे मकान से बैगाओं के अधिकार और शासकीय योजनाओं तक उनकी पहुॅंच को सुनिष्चित कराने का अथक प्रयास उनकी जिंदगी का एक प्रमुख हिस्सा बन गया है।
अपने संघर्षो को याद करते हुए कहती है कि जब साल 2004 में दामी-तितरही और उसके आस पास के गांव में बैगाओं की फसल को बड़े पैमाने पर कुछ वर्ग द्वारा जला और नष्ट कर दिया गया था, उस समय कई सारे गांव में इस तरह की घटनायें आम होती थी। उसके ाबद उनको संगठित कर चाड़ा में आंदोलन किया और जिला कलेक्ट्रट पर धरना दिया गया था। इसका परिणाम हुआ कि इस तरह की घटनाओं पर अंकुष लगा और वनाधिकार कानून लागू होने के बाद उनको अधिकार भी मिला।
उनका कहना है कि अभी भी कई सारे गांव में बैगा व्यक्तिगत और सामूहिक वनाधिकार के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वे गांव में महिलाओं को बच्चों को और पुरूषों को संगठित करती है और उनको विकासीय मुददों षिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण व भोजन सुरक्षा और आजीविका को बेहतर बनाने के लिए रास्ता दिखाती है और बदलाव के लिए कदम दर कदम उनके साथ चलती है।
वे बताती है कि बैगा समाज में महिलाओं को पुरूष दारू के नषे में प्रताडित करते थे, जो अब धीरे-धीरे कम हो रहा है, यह एक सकारात्मक बदलाव है। महिलाएं पहले की अपेक्षा अपने परिवार में फैसले लेने लगी है। बैगाओं के रहन-सहन में भी बदलाव आया है, उन्होनें साफ-सफाई और स्वच्छता के व्यवहार को अपनाया है।

महिला भूमि अधिकार की पैरवी करने वाली शोभा तिवारी एक संगठन की मदद से पूरे देष में सवंाद यात्रा भी निकाल चुकी है। इस दौरान अपने सहयोगियों के साथ कई प्रदेषों में यात्रा कर स्कूल, कालेज और समुदाय मे जाकर महिलाओं के समान सम्पत्ति अधिकार के लिए संवाद किया है। उनका कहना है कि महिलाओं को सम्पत्ति समान में अधिकार मिलने से उनके उपर होने वाली हिंसा में कमी आयेगी और उनके जीवन में बदलाव भी।

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